जब एक नागरिक भूख से लड़ता है और सत्ता मौन रहती हैसोनम वांगचुक का आंदोलन: लोकतंत्र के लिए एक आईना
जब एक नागरिक भूख से लड़ता है और सत्ता मौन रहती है सोनम वांगचुक का आंदोलन: लोकतंत्र के लिए एक आईना By Wisdom Warehouse लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब एक साधारण नागरिक भी बिना डर अपनी बात कह सके और उसे सुना जाए। आज सोनम वांगचुक का आंदोलन इसी मूल प्रश्न को हमारे सामने रखता है। यह केवल एक व्यक्ति की भूख हड़ताल नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास की परीक्षा है कि क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध की आवाज़ वास्तव में सुनी जाती है। सोनम वांगचुक ने अपने आंदोलन के लिए हिंसा का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने पत्थर नहीं उठाए, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाया और न ही लोगों को डराने की कोशिश की। उन्होंने अपने शरीर को ही अपनी आवाज़ बनाया। भारतीय इतिहास में भूख हड़ताल हमेशा नैतिक प्रतिरोध का प्रतीक रही है। महात्मा गांधी से लेकर कई सामाजिक आंदोलनों तक, यह तरीका सत्ता को चुनौती देने के बजाय उसके विवेक को जगाने का प्रयास माना गया है। जब किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ती है, तो सरकार पर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी होती है। इसी आधार पर प्रशासन ने कहा कि सोनम वांग...